आज अगर तुम घर पर होती,
तो घर को सर पर चढ़ा ली होती,
भाई कि टांग खींच रही होती,
काश के तुम आज घर पर होती।
आज अगर तुम घर पर होती,
पापा के इर्द गिर्द उछल रही होती,
मम्मी से लाड प्यार कर रही होती,
काश के तुम आज घर पर होती।
आज अगर तुम घर पर होती,
अपने भैया से फरमाइश मनवा रही होती,
और भैया पर प्यार का हक़ जता रही होती,
काश के तुम आज घर पर होती।
आज अगर तुम घर पर होती,
अच्छे अच्छे पकवान बना रही होती,
खिल-खिलाहट से घर को महका रही होती,
काश के तुम आज घर पर होती।
आज अगर तुम घर पर होती,
तुम यह कर रही होती, तुम वह कर रही होती,
लेकिन अगर तुम आज घर पर होती,
तुम्हारी याद इतनी ना आ रही होती॥
भावपूर्ण अभिव्यक्ति..
Comment by समीर लाल 'उड़न तश्तरी वाले' — August 18, 2008 @ 10:57 pm |
last line me sab kuchh keh diya aapne… bahut achchhe
Comment by Mahipal Vala (Pal) — August 21, 2008 @ 12:16 am |
very touchy
Comment by swati shah — May 8, 2009 @ 5:49 pm |
Bhagwan ki kripa se meri do behnein hain aur donon se main har saal rakhi bandhbata hoon par pata nahin is kavita ne mere kyun aansun la diye. main nahin jaanta
Comment by dev kumar — July 17, 2009 @ 12:47 pm |