बैठे थे उनके राह में,
इंतेज़ार कि लडीयाँ नापते हुए।
शाम डलने लागी, जाम पर जाम भरने लगें,
पर फीर भी वह नज़र न आई॥
नज़रें थक गई, आँखें भर आई।
पर फीर भी वह नज़र न आई॥
ताकते ताकते थक गए,
पर वह नज़र न आए।
अचानक वह नज़र जो आए तो,
पैमाने छलक गए जैसे, दिल के अरमान भडक गए ऐसे।
तीर दिल के आर पार भी हो,
पर निशान नज़र न आए॥
वह नज़र न आए तो दिल ऊब जाता है।
जो वह नज़र आए तो दिल डूब जाता है॥
हाय! इस दिल का क्या करूं?
न रोक सकूँ,
न टोक सकूँ,
हाए मैं करूँ तो क्या करूँ?
अभिजित जी,सुन्दर रचना है।बधाई।
बैठे थे उनके राह में,
इंतेज़ार कि लडीयाँ नापते हुए।
शाम डलने लागी, जाम पर जाम भरने लगें,
पर फिर भी वह नज़र न आई॥
Comment by paramjitbali — July 10, 2007 @ 9:40 pm |
बहुत सुंदर रचना लिखी है…प्रत्येक भाव मन को छू गये…।
Comment by divyabh — July 10, 2007 @ 11:33 pm |
ओये तु फिर आ गया नामाकुल…
दैख रीय्या हुँ दिन ब दिन खिलता ही जा रहा है. ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन कवि बनकर रहेगा, सम्भल जा भैये..
और सावधान, वो सुभाष भदौरिया नामक इंसान यहीं कहीं आसपास ही होंगे, अभी आ धमकेंगे. ही ही ही
Comment by pankaj bengani — July 11, 2007 @ 9:05 am |
he he he bahut khub. khub bhaalo bhaalo..
Comment by संजय बेंगाणी — July 11, 2007 @ 9:55 am |
shaiyri is good….I think
Comment by siddarth — July 11, 2007 @ 8:01 pm |
a nice one…..simple thoughts put together to creat a whirlpool of feelings…. waiting for some more ……..
Comment by Siddhartha — July 11, 2007 @ 10:57 pm |
kool shayari dadu…
awesome… thumbs up
Comment by Brinda — July 11, 2007 @ 11:00 pm |
good ones…
Comment by deepak — July 12, 2007 @ 9:34 am |
Hi Abhijit,
Wow! awesome expressions straight out of heart …into the the heart…
Comment by Prashant — July 15, 2007 @ 12:18 pm |
आ गया पटाखा हिन्दी का
अब देख धमाका हिन्दी का
दुनिया में कहीं भी रहनेवाला
खुद को भारतीय कहने वाला
ये हिन्दी है अपनी भाषा
जान है अपनी ना कोई तमाशा
जाओ जहाँ भी साथ ले जाओ
है यही गुजारिश है यही आशा ।
NishikantWorld
Comment by Nishikant Tiwari — August 31, 2007 @ 1:58 pm |
good one. really very inspiring….
keep on writing, best of luck for future.
Enjoy..
CHEERS !!
Comment by Harit — February 18, 2008 @ 11:44 pm |
अछ्चा लिखा है , अरे साब दिल मे बैठे हुए को बाहर नही ढुंढते….
Comment by swati shah — May 9, 2009 @ 9:13 am |