जब ग़म न था।
तो शायरी न थी॥
जबसे ग़म ज़िन्दगी में आया।
शायरी भी साथ में लहराने लगी॥
सुबह आई कई नयी।
मगर हम रहे वहीँ के वहीँ॥
ना बदले थे, ना बदले हैं, ना बदलेंगे।
पर ज़माने बदलते ही रहेंगे॥
जब ग़म न था।
तो शायरी न थी॥
जबसे ग़म ज़िन्दगी में आया।
शायरी भी साथ में लहराने लगी॥
सुबह आई कई नयी।
मगर हम रहे वहीँ के वहीँ॥
ना बदले थे, ना बदले हैं, ना बदलेंगे।
पर ज़माने बदलते ही रहेंगे॥
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पोस्ट आती हैं नित नई
हम टिप्पणी करते थे, करते हैं, करते रहेंगे.
Comment by समीर लाल — May 9, 2007 @ 5:45 pm |
नज़रिया बहुत हैं लेकिन
नज़रिया बहुत हैं लेकिन दादु
नज़ारा एक हि है
Comment by Sivaprasad — May 9, 2007 @ 5:54 pm |
सुबह आई कई नयी।
मगर हम रहे वहीँ के वहीँ॥
ना बदले थे, ना बदले हैं, ना बदलेंगे।
बहुत खूब….
Comment by ranjana — May 9, 2007 @ 6:18 pm |
अभिजीत जी,
जिन्दगी मे गम तो होते ही हैं।
उसने आप को कवि बना दिया।
लेकिन वक्त के साथ अपने को बदलने की कोशिश जरूर करो।
खुशनुमा घड़िओ को भी याद करो।
उन के बारे मे भी कुछ लिखो।
Comment by paramjitbali — May 9, 2007 @ 6:49 pm |
Hey dadu,
We all know u r a good poet..
we all have various prob in our life to face so we always look out for a change…
so plz write something that does not give ghum but happiness…
Comment by anamika — May 9, 2007 @ 10:08 pm |
हर सवेरा नया कुछ लाता है….
और सवेरा ज़रूर आता है…..
बाहारें आति है पतझड के बाद,
जीना क्या ज़िन्दगी से हार के।
Comment by Siddhartha — May 9, 2007 @ 10:34 pm |
बहुत दिनो बाद दिखे। चलो भाई लगातार लिखते रहना।
Comment by संजय बेंगाणी — May 10, 2007 @ 9:25 am |
ओये छड्ड यार!!!
भाड में गया गम,
रोना कर कम,
दम मारो दम।
फोड खुशी के बम,
पी सोडा या रम,
मत कर आँखे नम,
दम मारो दम।
गम ना होंगे कभी कम,
ना जाएंगे कभी थम,
है अगर तुझमे दम,
तो क्या है फिर ये गम,
दम मारो दम।
तो गुरू… हो जाओ शुरू…
Comment by पंकज बेंगाणी — May 10, 2007 @ 11:08 am |
hey! good!
NICE TRY BT STILL…ENERGY IN WRONG DIRECTION… SORRY!
like thy say.
THE TIME IS NW…, THE MOMENT IS HERE… & ABOVE ALL UR HERE.
SO DO THE DO. CLOCK’S TICKING…. TIK! TIK! TIK!… & IF NT THN BOOM!…
Jst like thy say!….
GOOD LUCK…..
Pal
ps!No hard feeling pls! huh!
Comment by Shivien — May 10, 2007 @ 6:10 pm |
किस-किस को याद करें, किस-किस को रोयें,…
आराम बडी़ चीज है, मुँह ढक के सोयें,…
- सुनीता
Comment by sunita(shanoo) — May 10, 2007 @ 7:20 pm |
gham me bhi dum hai.. sundar likha hai
Comment by swati — May 25, 2009 @ 3:40 pm |