अभिजीत की कलम

January 9, 2007

रिश्ते – बदनामी – समाज

Filed under: गम, शायरी — abhijitc @ 10:11 pm

रिश्ते होते हैं कई अनेक।
भाई – बहन, माँ – बाप, बीवी – बच्चे, रुप अनेक॥

रिश्ते बनाओ समाज के अनुमति से।
वर्ना गुज़ारो ज़िन्दगी बदनामी में॥

इन रिश्तों को न करो बदनाम।
जमाने से है यही विनती हरदम॥

8 Comments »

  1. फुर्सत किसे है ज़ख्मो पे मरहम लगाने की,
    निगाहें बदल गई अपने और बेगाने की।
    तुम ना छोड़ना दोस्ती का हाथ कभी,
    वरना तमन्ना ना रहेगी नया दोस्त बनाने की॥

    - शीलु

    Comment by sheelu — January 9, 2007 @ 11:12 pm | Reply

  2. भाई थोड़ा अगर विस्तार मिल जाता तुम्हारे आदर्श को, तो ये एक बहुत अच्छा लेख होता।
    मै कहुंगा कि मेरी बात पर थोडा ध्यान दो तो मज़ा आ जाए।

    Comment by Divyabh — January 10, 2007 @ 12:04 am | Reply

  3. क्या कहना चाहते हो, हमें बता दो, हम कह देंगे…
    काहे इतना तकलीफ ऊठा रहे हो???
    बता दे यार, बार बार यूँ ही बेकार जाने देने के!!!

    Comment by समीर लाल — January 10, 2007 @ 7:06 am | Reply

  4. समाज की मान्यताओं से परे तथा उसे समझ न आए,
    ऐसे रिश्ते बनाने से बदनामी ही मिलती है।

    मगर साहस से डटे रहें।

    Comment by संजय बेंगाणी — January 10, 2007 @ 9:48 am | Reply

  5. I know what you are trying to say…, but a lot needs to be discussed on this thought.

    Comment by Siddhartha — January 10, 2007 @ 3:23 pm | Reply

  6. People only know how to doubt on others they never check in their collars how good they are.

    Comment by Anamika — January 10, 2007 @ 8:57 pm | Reply

  7. आँख बन्द कर लो, फिर मेरे यार,
    सोचो कि क्या तुम सही हो|

    यही दोहराओ दो बार,
    और अगर फिर भी जवाब मिले हाँ ही,
    तो छोड दे जमाने के गम,
    और भी टेंशन क्या है कम।

    लगा रह युँ ही लडता,
    जमाने की परवाह ना करता,
    डटकर मुकाबल कर,
    मन से निकालकर डर।

    क्योंकि कि यदि मन कहे,
    कि तुम हो सही,
    तो फिर क्या फिकर है,
    क्या जग ने कही, क्या ना कही।

    - पंकज

    Comment by pankaj — January 11, 2007 @ 12:33 pm | Reply

  8. Nice one Abhijit, keepup the good work!!!

    Comment by Dixit — January 11, 2007 @ 2:47 pm | Reply


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