अभिजीत की कलम

December 19, 2006

शक और प्यार

Filed under: गम, शायरी — abhijitc @ 7:34 pm

शक वह बिमारी है।
जिसका कोई इलाज नहीं॥

प्यार वह भावना है।
जिसका कोई मोल नहीं॥

जो प्यार पर शक करता है।
उसे समझाए येसा किसी में दम नही॥

7 Comments »

  1. छोटी सी बात पर भेद गहरा है,
    शायद तभी प्यार पर पहरा है।

    Comment by पंकज बेंगाणी — December 19, 2006 @ 7:59 pm | Reply

  2. लगता है लिखना छोड़ोगे नहीं।
    ठीक है, लिखो खुब लिखो।

    कम से कम इसी बहाने सही,
    यहाँ पर तो दिखो।

    :) :)

    Comment by संजय बेंगाणी — December 19, 2006 @ 8:17 pm | Reply

  3. “शक वह बिमारि है जिस्का कोइ इलाज नही …”

    सही है भाउ…

    true..very true.

    Comment by Siddhartha — December 19, 2006 @ 11:46 pm | Reply

  4. Well said dada…. :) ….
    लिखते रहो…

    Comment by bipasha — December 20, 2006 @ 12:58 pm | Reply

  5. चिता मृत व्यक्ति को जलाती है।
    चिंता और शक आदमी को जीवित ही जलाते हैं।
    यह दाह तो सबसे विनाशकारी है।

    Comment by प्रियंकर — December 22, 2006 @ 4:37 pm | Reply

  6. जहाँ शक हो वहाँ प्यार की आस नहीं।
    शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं। :D

    Comment by Shrish — December 27, 2006 @ 7:24 am | Reply

  7. Truly said dadu…! In today’s world each and every relation is given a blackspot even if its a pure relation of bro-n-sis.

    Comment by anamika — January 10, 2007 @ 8:55 pm | Reply


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