शक वह बिमारी है।
जिसका कोई इलाज नहीं॥
प्यार वह भावना है।
जिसका कोई मोल नहीं॥
जो प्यार पर शक करता है।
उसे समझाए येसा किसी में दम नही॥
शक वह बिमारी है।
जिसका कोई इलाज नहीं॥
प्यार वह भावना है।
जिसका कोई मोल नहीं॥
जो प्यार पर शक करता है।
उसे समझाए येसा किसी में दम नही॥
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छोटी सी बात पर भेद गहरा है,
शायद तभी प्यार पर पहरा है।
Comment by पंकज बेंगाणी — December 19, 2006 @ 7:59 pm |
लगता है लिखना छोड़ोगे नहीं।
ठीक है, लिखो खुब लिखो।
कम से कम इसी बहाने सही,
यहाँ पर तो दिखो।
Comment by संजय बेंगाणी — December 19, 2006 @ 8:17 pm |
“शक वह बिमारि है जिस्का कोइ इलाज नही …”
सही है भाउ…
true..very true.
Comment by Siddhartha — December 19, 2006 @ 11:46 pm |
Well said dada….
….
लिखते रहो…
Comment by bipasha — December 20, 2006 @ 12:58 pm |
चिता मृत व्यक्ति को जलाती है।
चिंता और शक आदमी को जीवित ही जलाते हैं।
यह दाह तो सबसे विनाशकारी है।
Comment by प्रियंकर — December 22, 2006 @ 4:37 pm |
जहाँ शक हो वहाँ प्यार की आस नहीं।
शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं।
Comment by Shrish — December 27, 2006 @ 7:24 am |
Truly said dadu…! In today’s world each and every relation is given a blackspot even if its a pure relation of bro-n-sis.
Comment by anamika — January 10, 2007 @ 8:55 pm |