अभिजीत की कलम

August 18, 2008

आज रक्षा बन्धन, काश के तुम घर पर होती!

Filed under: त्योहार, प्यार, रिश्ते — abhijitc @ 1:04 pm

आज अगर तुम घर पर होती,
तो घर को सर पर चढ़ा ली होती,
भाई कि टांग खींच रही होती,
काश के तुम आज घर पर होती।

आज अगर तुम घर पर होती,
पापा के इर्द गिर्द उछल रही होती,
मम्मी से लाड प्यार कर रही होती,
काश के तुम आज घर पर होती।

आज अगर तुम घर पर होती,
अपने भैया से फरमाइश मनवा रही होती,
और भैया पर प्यार का हक़ जता रही होती,
काश के तुम आज घर पर होती।

आज अगर तुम घर पर होती,
अच्छे अच्छे पकवान बना रही होती,
खिल-खिलाहट से घर को महका रही होती,
काश के तुम आज घर पर होती।

आज अगर तुम घर पर होती,
तुम यह कर रही होती, तुम वह कर रही होती,
लेकिन अगर तुम आज घर पर होती,
तुम्हारी याद इतनी ना आ रही होती॥

July 10, 2007

उनका नज़र आना, न आना

Filed under: प्यार, शायरी — abhijitc @ 8:31 pm

बैठे थे उनके राह में,
इंतेज़ार कि लडीयाँ नापते हुए।
शाम डलने लागी, जाम पर जाम भरने लगें,
पर फीर भी वह नज़र न आई॥

नज़रें थक गई, आँखें भर आई।
पर फीर भी वह नज़र न आई॥

ताकते ताकते थक गए,
पर वह नज़र न आए।

अचानक वह नज़र जो आए तो,
पैमाने छलक गए जैसे, दिल के अरमान भडक गए ऐसे।
तीर दिल के आर पार भी हो,
पर निशान नज़र न आए॥

वह नज़र न आए तो दिल ऊब जाता है।
जो वह नज़र आए तो दिल डूब जाता है॥

हाय! इस दिल का क्या करूं?
न रोक सकूँ,
न टोक सकूँ,
हाए मैं करूँ तो क्या करूँ?

May 9, 2007

ज़िन्दगी चलती रहती है।

Filed under: गम, शायरी — abhijitc @ 4:26 pm

जब ग़म न था।
तो शायरी न थी॥
जबसे ग़म ज़िन्दगी में आया।
शायरी भी साथ में लहराने लगी॥

सुबह आई कई नयी।
मगर हम रहे वहीँ के वहीँ॥
ना बदले थे, ना बदले हैं, ना बदलेंगे।
पर ज़माने बदलते ही रहेंगे॥

March 2, 2007

होली का बहार

Filed under: त्योहार, शायरी — abhijitc @ 10:27 pm

होली का त्योहार आया ।
सब के मन में बहार लाया ॥

रंग से रंग मिले ।
भंग से भंग मिले ॥

दिल से दिल मिले ।
दिलवाले से दिलवाले मिले ॥

लेकिन हमारे दिल किन से मिले ।
जो हमारी दिलवाली न मिले ॥

February 4, 2007

मेरी प्यारी बहना

Filed under: रिश्ते, शायरी — abhijitc @ 11:40 am

जाने कब से तड़प रहा था ।
एक प्यारी-सी बहना के लिए ॥

बचपन से मुझे थी यह आस ।
की होगी एक लाडली बहना, मेरे भी पास ॥

इंतज़ार की लडीयाँ नापते हुए, कट रही थी यह ज़िन्दगी ।
आशा कि एक किरण थी, लेकिन वह भी अब बुझ रही थी ॥

अचानक आई तुम मेरी ज़िन्दगी में ।
तो जैसे बहार आई मेरी ज़िन्दगी में ॥

इतने दिनों कि थी जो मेरी जलन ।
आज होगी दूसरे की जलन ॥

अब तक जो लोग मुझे रिझाते थे ।
अब आई है बारी उनके रिझने कि ॥

बस अब तो है सिर्फ इतनी-सी दुआ ।
भाई – बहन कि यह प्यारी जोडी रहे सलामत हंमेशा ॥

January 9, 2007

रिश्ते – बदनामी – समाज

Filed under: गम, शायरी — abhijitc @ 10:11 pm

रिश्ते होते हैं कई अनेक।
भाई – बहन, माँ – बाप, बीवी – बच्चे, रुप अनेक॥

रिश्ते बनाओ समाज के अनुमति से।
वर्ना गुज़ारो ज़िन्दगी बदनामी में॥

इन रिश्तों को न करो बदनाम।
जमाने से है यही विनती हरदम॥

December 19, 2006

शक और प्यार

Filed under: गम, शायरी — abhijitc @ 7:34 pm

शक वह बिमारी है।
जिसका कोई इलाज नहीं॥

प्यार वह भावना है।
जिसका कोई मोल नहीं॥

जो प्यार पर शक करता है।
उसे समझाए येसा किसी में दम नही॥

December 12, 2006

ज़िन्दगी में साथ

Filed under: गम, शायरी — abhijitc @ 4:07 pm

ज़िन्दगी की राह में चले हम,
बाधाओं से जुझते हुए।

साथ अपनों का छुटता गया,
आखिर में रह गये हम अकेले।

ग़म और ज़िन्दगी

Filed under: गम, शायरी — abhijitc @ 3:32 pm

ग़म की शायरी करते रहे।

ज़िन्दगी का मज़ाक उडाते रहे।

पता न था कि एक दिन ऐसा भी आयेगा।

ग़म होगा बसेरा मेरा।

और ज़िन्दगी मेरा मज़ाक उडाता जायेगा।

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